
आप में से ऐसा कोई ना होगा जो इंकलाब की बाते न करता हों. लेकिन क्या आप जानते हैं की इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा किसने दिया?
अगर नहीं जानते तो मै आप को बताता हू की इंकलाब का नारा किसने दिया। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा देने वाले कोई और नहीं बल्कि अपने दौर के मशहूर शायर हसरत मोहानी जी ने दिया . हसरत मोहानी का वो ग़ज़ल जिसे अपने कभी न कभी सुना ही होगा जो हर दौर में पढ़ा और सुना जाता हैं.
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।
आप हसरत मोहानी की शख्सियत इसी बात से अंदाजा लगा लीजिए की शायर, महान नेता, सूफ़ी, दरवेश, योद्धा, पत्रकार, आलोचक, शोधकर्ता , मुस्लिम कम्युनिस्ट और जमीयत उलेमा जब ये सब सारे लकब एक साथ होता है तब जा के एक शख्सियत बनता है जिसका नाम हसरत मोहानी होता है।
हसरत मोहानी का पूरा नाम सय्यद फजलुल हसन था ।
इनका जन्म 14 अक्टूबर 1878 के उन्नाव में हुआ था । ये मशहूर स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा और अपने गजलों के लिए जाने जाते है। जब अंग्रेजो ने भारत पर पुरी तरह से कब्ज़ा कर लिया था तो हसरत मोहानी ने ही ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया। और कई सारे आंदोलन किए इन्होने ने गांधी जी का बखूबी साथ दिया। और अंग्रेजो को भारत से भागने में काफ़ी बड़ा योगदान दिया ।
हसरत मोहानी की गजलें और शेर।
• चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ’तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है।।
• नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती।।
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं।।
• आरज़ू तेरी बरक़रार रहे।
दिल का क्या है रहा रहा न रहा।।
• वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ।
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ।।
• हम क्या करें अगर न तिरी आरज़ू करें।
दुनिया में और भी कोई तेरे सिवा है क्या।
• शेर दर-अस्ल हैं वही ‘हसरत’
सुनते ही दिल में जो उतर जाएँ।।
• देखा किए वो मस्त निगाहों से बार बार
जब तक शराब आई कई दौर हो गए।।
