फैज़ अहमद फ़ैज़ को समझा जा सकता है उनके इन शेरों से.

फैज़ अहमद फ़ैज़ ( फ़ाइल फ़ोटो)

फैज़ अहमद फ़ैज़: पाकिस्तान के सबसे इंकलाबी और बागी शायरों में गिने जानें वाले शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जिन्होंने ने पाकिस्तान के हुक्मरानों को अपने शेरों के दम पर उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। ये आवाम के दिलों में बसने वाले सच्चे शायर थे। जुल्म को खुली चुनौती देते थे और उसका खुल के सामना करते थे। फ़ैज़ साहब के शेर रूहानियत, अहसास ओ शिद्दत से भरपूर होती हैं, इनके शेर जिंदगी को नया मकान दिखाती हैं और और इंकलाब की नीव रखती हैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के शेरों से समझा जा सकता है की फ़ैज़ साहब के विचार कैसे थे। आइए जानते हैं उनके कुछ गजलों और शेरों को!

. दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा हैं कोई शब–ए –गम गुजार के

दुनियां ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझसे भी दिल फरेब हैं गम रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज फ़ैज़ मत पूछ वलवले दिल–ए –ना –कर्दा–कार के

. और भी दुःख है जमाने में मोहब्बत के सिवा राहते और भी है वस्ल के राहत के सिवा

. दिल ना उम्मीद ही सही नाकाम ही तो हैं लंबी हैं गम की शाम मगर शाम ही तो हैं।

. और क्या देखने को बाकी हैं आपसे दिल लगा के देख लिया

. तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं तो किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।

. आप की याद आती रही रात भर चांदनी दिल दुखाती रही रात भर।

. हम परवरिश लौह वो कलम करते रहेंगे जो दिल पे गुजरती हैं रकम करते रहेंगे।

. सारी दुनियां से दूर हो जाय जो ज़रा तेरे पास हो बैठे

. हर सदा पर लगे है कान यहां दिल संभालते रहो जबां की तरह

मीर असर: “क्या कहूं किस तरह से जीता हूं गम को खाता हूं आंसू को पीता हूं ” मीर असर के रूहानी शेर।

शायर मीर असर

मीर असर: इनका असली नाम ख़्वाजा मोहम्मद मीर असर देलहवी था। इनका जन्म 1795 में दिल्ली में हुआ था। ये सूफ़ी शायर ख्वाजा मीर दर्द के छोटे भाई हैं। शायरी का शुरुआती दौर इन्होंने ने अपने भाई से ही सीखा हैं। इनके गज़ल और शेर में रूहानियत और मज़हबी का बेहतरीन मेल देखने को मिलता हैं।

आइए जानते है इनके मशहूर गजलें और शेर।

. न लगा ले गए जहां दिल को आह ले जाइए कहां दिल को

मुझ से ले तो चले हो देखो पर तोड़िए मत मिया कहीं दिल को

दुश्मनी तू ही इससे करता है दोस्त रखता हैं एक जहां दिल को

. दिल में सौ अरमान रखता हु प्यारे आखिर मैं जान रखता हूं

आह तेरे भी ध्यान में कुछ हैं इस कदर तेरा ध्यान रखता हूं

. क्या कहूं किस तरह से जीता हूं गम को खाता हूं आंसू को पीता हूं

. बेवफ़ा कुछ नही तेरी तकसीर मुझको मेरी वफ़ा ही रास नहीं

. यूं खुदा की खुदाई बर – हक़ हैं पर असर की हमे आस नहीं।

. तू कहां मै कहां प रहते हैं की आपस में दोनों रहते हैं

“हम अम्न चाहते है मगर जुल्म के खिलाफ़ गर जंग लाज़मी है तो जंग ही सही” साहिर लुधियानवी की वो फेमस शेर जो आज दुनियां भर में प्रसिद्ध हैं।

साहिर लुधियानवी

साहिर लुधियानवी: हर दौर में इंकलाब का पहला नीव शायरों के शायरी ने रखा हैं अगर उनमें से सबसे ज्यादा इंकलाब की शायरी लिखने वालों में साहिर लुधियानवी का नाम पहले आता है। साहिर साहब ने मोहब्बत करने वालों के लिए अपनी गजलें और शेर के ज़रिए उन्हें नया रास्ता दिखाया हैं । साहिर साहब ने जितने भी गाने फ़िल्मों के लिए लिखे है वो आज अमर हो गया हैं। अगर देखा जाय तो साहिर का स्थान आज के दौर में कोई भी शायर नहीं ले सकता। साहिर साहब ने मोहब्बत से लेकर जंग तक और जमी से लेकर आसमा तक की शायरी की हैं। आइए जानते हैं इनकी शायरी।

1. मिलती है जिंदगी में मोहब्बत कभी कभी होती हैं दिलबरों की इनायत कभी कभी

2. मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया

बर्बादियो को शोग मानना फिजूल था बर्बादियो का जश्न मनाता चला गया।

3. कभी ख़ुद पे कभी हालात पर रोना आया बात जब निकली तो हर बात पर रोना आया

हम तो समझे थे की भूल गए है उनको क्या हुआ आज किस बात पर रोना आया

4. खून अपना हो या पराया हो नस्ल– ए –आमद का खून है आखिर

जंग मशरिक में हो या मगरिब में अमन ए आलम का खून है आख़िर

5. तू हिंदू न बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।

6. तेरा मिलना खुशी की बात सही तुझसे मिलकर उदास रहता हूं।

7. हज़ार बर्क गिरे लाख आंधियां उठे वो फूल खिल कर रहेंगे जो खिलने वाले हैं

8. आप दौलत की तराजू में दिलों को तौले हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं।

9. जंग तो ख़ुद एक मसला हैं जंग क्या मसलों को हल देगी।

10. ए महलों ए तख्तों ए ताज़ों की दुनियां इंसा के दुश्मन समाजों की दुनियां ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनियां ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या हैं।

“अब तो कहते हैं कि घबराके मर जायेंगे मर के भी चैन नहीं पाया तो किधर जायेंगे ” इब्राहिम जौक के मकबूल शेर!

इब्राहिम जौक ( फ़ाइल फ़ोटो)

ोहम्मद इब्राहिम जौक : एक दौर था जब उर्दू शायरी के सबसे बड़े शायर कहे जाते थे जौक यहां तक कि मिर्ज़ा ग़ालिब और मोमिन खां मोमिन से बड़े शायर माने जाते थे । ज़ौक जिस भी दरबार में जाते थे शेर पढ़ने के लिए वहां के लोग इनके दीवाने हो जाते थे और इनका लोहा हर कोई मानता था। लेकिन वक्त ने करवट लिया और इन्हे गुमनामी में डाल दिया कुछ लोगो ने तो यहां तक कह दिया की ग़ालिब के साथ इनका नाम तक नहीं लिया जा सकता हैं। आज भले ही गालिब जितना पहचान ना मिल पाई हो लेकिन इनकी शायरी किसी बेहतरीन शायर से कम भी नहीं हैं। इनकी शायरी रूहानियत को एहसास कराती हैं.!

1. अब तो कहते हैं घबराके मर जायेंगे मर के भी चैन नहीं पाया तो किधर जायेंगे

2. तुम भूल कर भी याद नहीं करते हों कभी हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके।

3. जाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यों क्या डेढ़ चुल्लू पानी में मेरा ईमान बह गया।

4. वक्त ए पीरी शबाब की बाते ऐसे हैं जैसे ख़्वाब की बाते।

सुनते हैं उसको छेड़ छेड़ कर हम किस मज़े से इताब की बाते ।

5. मालूम जो हमे होता अंजाम ए मोहब्बत लेते ना कभी भूल कर हम नाम ए मोहब्बत

6. हम रोने पर आ जाए तो दरिया ही बहा दे शबनम की तरह से हमे रोना नहीं आता।

7. तू जान हैं हमारी और जान हैं सब कुछ ईमान ही कहेंगे ईमान हैं तो सब कुछ।

ईद पर कहे गए टॉप 10 शेर।

1. ईद का चाँद तुम ने देख लिया
चाँद की ईद हो गई होगी।।

~इदरीस आज़ाद


2. तुझ को मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी
ईद अब के भी दबे पाँव गुज़र जाएगी

~जफर इकबाल

3. ईद आई तुम न आए क्या मज़ा है ईद का
ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का।

~अज्ञात

4. ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ ‘असलम’
अपने दरवाज़े को बाहर से मुक़फ़्फ़ल कर के।

~ असलम

5. दिल से दिल ना मिला ईद हो गई
कोई गले भी ना मिला ईद हो गई

तुमने ही तो कहा था ईद ख़ुशी है
मुझे खुशी भी ना मिला ईद हो गई

दबे कुचले पांव से गुजर भी गई
मुझे पता भी नहीं चला ईद हो गई

~Kssiddiqui

6. उस मेहरबाँ नज़र की इनायत का शुक्रिया
तोहफ़ा दिया है ईद पे हम को जुदाई का

~ अज्ञात

7. ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें
इक बरस दिन की मुलाक़ात है ये भी न सही

~ शोला

8.बादबाँ नाज़ से लहरा के चली बाद-ए-मुराद
कारवाँ ईद मना क़ाफ़िला-सालार आया

~जोश मलीहाबादी

9. मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी
अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

~अज्ञात

10. ऐ हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो
और कहियो कि कोई याद किया करता है

~त्रिपुरारी

“जो गुजारी ना जा सकी हमसे हमने वो जिंदगी गुजारी हैं ” जौन एलिया आज के सबसे पसंदीदा शायर क्यों हैं?

सैय्यद जौंन एलिया ( फाइल फ़ोटो)

शायर: सैय्यद जौन एलिया का जन्म यूपी के अमरोहा में हुआ था। इनके खानदान में सभी इल्मी लोग थे इनके पिता ख़ुद एक शायर थे। और पिता से ही इनमे शायरी का हुनर आया। जौन एलिया आज के दौर के सबसे बड़े शायर माने जाते इन्होंने ने दर्द और गम में डूबकर रूहानी शेरों को जना जो आज लोगों के जुबां पर रहता हैं।

जौन एलिया के ग़ज़ल और शेर

1. एक हुनर हैं जो कर गया हूं मैं सब के दिल से उतर गया हूं मैं

कैसे अपनी हंसी को जब्त करू सुन रहा हु की घर गया हूं मैं।

अजब इल्जाम हूं जमाने का की यहां सब के सर गया हूं मै।

2. एक नया रिश्ता पैदा क्यों करे हम जब बिछड़ना हैं तो झगड़ा क्यों करें हम।

ये काफ़ी है की हम दुश्मन नहीं हैं वफा दारी का दावा क्यों करें हम।

नहीं दुनियां को जब परवाह हमारी तो दुनियां को परवाह क्यों करें हम।

3. जो गुजारी ना जा सकी हमसे हमने वो जिंदगी गुजारी हैं।।

4. मैं भी बहुत अज़ीब हु इतना अजीब हूं की बस ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

5 . ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता एक ही सख्स था जहान में क्या।

6. बहुत नज़दीक आती जा रही हो बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या।

7 . सारी दुनियां के गम हमारे हैं और सितम ये हैं की हम तुम्हारे हैं

8 . और तो क्या था बेचने के लिए अपने आंखो के ख़्वाब बेचा है हमने।

लगेगी आग तो आयेंगे घर कई जद में यहां पर सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है! डॉक्टर राहत इंदौरी के वह शेर जो आज इंकलाब को नया पैग़ाम देता हैं!

डॉ. राहत इंदौरी ( फाइल फ़ोटो)

इंदौर: इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े शायर डॉ. राहत इंदौरी के शेर जो आज इंकलाब का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। जब भी जुल्म होता है तो लोग इन्ही के शेर पढ़कर लोगो में क्रांति भरते हैं। इनके शेर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की संसद से लेकर गली नुक्कड़ तक पर पढ़े और सुने जाते है। राहत साहब आज भले ही हमारे बीच में नहीं है लेकिन इनके शेर पढ़ने के बाद लगता है की वो हर जगह है जुल्म से लेकर मोहब्बत तक में इनके शेर लोगों के दिलो पर गहरी असर छोड़ती हैं। मानो ऐसा लगता है की जैसे नई ताज़गी मिल गई हैं।

आइए जानते है राहत साहब के वो शेर जो आज क्रांति को नया नज़रिया दे रही हैं..

1 . लगेगी आग तो आयेंगे घर कई जड़ में यहां पर सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी हैं।

2. सभी का खून शामिल यहां की मिट्टी में किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी हैं!

3. हम अपने जान के दुश्मनों दुश्मन–ए जां कहते हैं मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते है।।

4. अड़े थे जिद पर की सूरज बना के छोड़ेंगे पसीने छूट गए एक दिया बनाने में मेरी निगाह में ओ शख्स आदमी भी नही जिसे जमाना लगा है खुदा बनाने में।

5. शाखों से टूट जाए वो पत्ते नहीं हैं हम आंधियों से कह दो औकात में रहें।

6. अब कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल को आप तो कत्ल का इल्ज़ाम हमी पर रख दो

7. मैं जब में जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना।

8. हैं दुनियां छोड़ना मंजूर लेकिन वतन को छोड़कर जानें का नई।

9. अभी गनीमत है मेरा सब्र अभी लबालब भरा नहीं हू वो मुझको मुर्दा समझता हैं उससे कहो अभी मरा नहीं हूं

10. जनाजे पर लिख देना यारों मोहब्बत करने वाला जा रहा हैं।

Father’s day: पर पर कहें गए शायरों के शेर।

Father’s day: वैसे तो मेरा मानना है कि की मां बाप का एक दिन नहीं बल्कि मां बाप से ही दिन होता हैं। लेकिन फिर भी एक स्पेशल डेट मुकर्रर किया गया हैं। जिस तरह से अनेकों त्योहार का एक दिन मुकर्रर होता है उसी तरह से रिश्तों में भी एक मुकर्रर दिन होता हैं ।

जैसे आज पूरी दुनियां में फ़ादर्स डे मनाया जा रहा है लोग अपने बाप के साथ सोशल मीडिया पर फ़ोटो पोस्ट करते है और उसके साथ शेर भी लिखते हैं। तो क्या आपको पता है की वो शेर किस शायरों के होते हैं? अगर नहीं तो आज हम आपको बताते हैं। शायरों की शायरी..

घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

~आलोक श्रीवास्तव

हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने

~ मेराज फैजाबादी

ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ
इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा

~मुनव्वर राणा

बुरे वक्त में जो टूटा है तो टूट कर बिखर जाता।
अगर सर पर बाप का हाथ ना होता तो मर जाता।

~KS Siddiqui

घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूँगा
ग़म छुपा कर मिरे माँ बाप कहाँ रखते थे

~साजिद जावेद

मुद्दत के बाद ख़्वाब में आया था मेरा बाप
और उस ने मुझ से इतना कहा ख़ुश रहा करो

~अब्बास ताबिश

मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते

~मेराज फैजाबादी

हड्डियाँ बाप की गूदे से हुई हैं ख़ाली
कम से कम अब तो ये बेटे भी कमाने लग जाएँ

~रऊफ खैर

संत कबीर दास की जयंती पर पढ़िए उनके 8 दोहे जो आपको बताएंगे जिदंगी के असली मकसद।

संत कबीर दास संत कबीर दास जयंती : कबीर दास जी एक बहुत बड़े विद्वान , लेखक, कवि और विचारक के रूप में जाने जाते है। इन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में फैले बुराइयों को मिटाने के लिए लगा दिया। इन्होंने अपनी सारी धार्मिक शिक्षा रामानंद नामक गुरु से ली। और एक दिन वो गुरु […]

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उबैदुल्लाह अलीम के चुनिंदा कलाम।

ओबैदुल्लाह अलीम

उबैदुल्ला अलीम का जन्म 12 जून 1939 को भोपाल में हुआ था। और विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे।

उबैदुल्लाह अलीम के मशहूर ग़ज़ल और शेर।

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए

मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी
कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए

मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए

ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए

मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ
जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए

हर एक लहज़ा यही आरज़ू यही हसरत
जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाए

कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझ को मार दिया

इक सब्ज़ शाख़ गुलाब की था इक दुनिया अपने ख़्वाब की था
वो एक बहार जो आई नहीं उस के लिए सब कुछ हार दिया

ये सजा-सजाया घर साथी मिरी ज़ात नहीं मिरा हाल नहीं
ऐ काश कभी तुम जान सको जो इस सुख ने आज़ार दिया

ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ

हवा के दोश पे रक्खे हुए चराग़ हैं हम
जो बुझ गए तो हवा से शिकायतें कैसी

आँख से दूर सही दिल से कहाँ जाएगा
जाने वाले तू हमें याद बहुत आएगा

जो दिल को है ख़बर कहीं मिलती नहीं ख़बर
हर सुब्ह इक अज़ाब है अख़बार देखना

ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए
तो आसमान से उतरा ख़ुदा हमारे लिए

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