शकील बदायूंनी के “Death Anniversary” पर इनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें..

शकील बदायूंनी

शकील बदायूंनी एक ऐसा नाम जो हमेशा से हर जुबां पर रहता है। इनके लिखें गीत हो या शेर या इनके कहें गजलें हो हर दौर में फिट बैठता है हर दिन इनके कलाम करोड़ों लोग पढ़ते हैं। इनका जन्म 3 अगस्त 1916 में बदायूं में हुआ इनके पिता “मो. जमाल अहमद सोखता कादरी” जो बदायूं के बेड़े विद्वान, उपदेशक और एक बेहतरीन शायर थे। देखा जाय तो शकील बदायूंनी साहब का खानदान ही शायराना था इनके चाचा भी नात और शेर कहने के मामले में उस्ताद का लकब हासिल था। अपने चाचा के देख रेख में ही इन्होंने ने 14 वर्ष की आयु में ही शेर कहना और लिखना शुरू कर दिया और साथ साथ ही शिक्षा प्राप्त करने मुंबई और अलीगढ़ से पढ़ाई पूरी की।

दो साल के भीतर ही शायरी में अपना अलग नाम बना लिया

सन 1942 से 1944 के बीच शकील बदायूंनी ने अपने शायरी के जलवे बिखेरने लगे लोग इनके लिखे ग़ज़ल

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया

जाने आज क्यों तेरे नाम पर रोना आया

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस क़दर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का ‘शकील’
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

पढ़ कर लोग इनके दीवाने होने लगे ।

शकील बदायूंनी उस समय के सभी मुशायरों में अलग ही रंग जमाते थे जिस कारण से उनका कद भी लोगो को प्रभावित करता था वे मुशायरों के बेहद पॉपुलर शायर थे जिस मुशायरे में होते थे, शाइरी सुनाने के बाद सारा मुशायरा लुटकर ले जाते थे उनके साथ मुशायरों में ‘शेरी भोपाली’, ‘दिल लखनवी’, ‘राज मुरादाबादी’, ‘मजरूह सुल्तानपुरी’, सभी शामिल होते थे । ये सभी इनके हुनर की तारीफ करते थे।

1944 में मुंबई आए और एक से बढ़कर एक गाने लिखे.

शकील बदायूंनी साहब जब मुंबई आए तो इनकी मुलाकात उस समय के बड़े निर्माता कारदार और संगीतकार नौशाद से हुई और फिल्म चौदवी का चांद और मुगले आज़म जैसी फिल्मों के गाने लिखे जो सारे गाने हिट हुए और बॉलीवुड में अपना एक अलग पहचान बनाई। आज के दौर में भी इनके गाने हिट रहते है।. चाहे वो

चौदावी का चांद हो.

जब प्यार किया तो डरना क्या

नन्हा मुन्ना राही हु देश का सिपाही हु

दुनियां में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा

गाए जा गीत मिल के.

इन्हीं सब गानों और शेर के वजह से इन्हें मोहब्बत का शायर कहा जाता हैं।

शकील बदायूंनी साहब उर्दू शायरी में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। जो सदियों तलक लोगों के जहन में गूंजता रहेगा।

आज ही के दिन यानी 20 अप्रैल 1970 को महज़ 54 वर्ष की उम्र में ही ये नायब सितारा दुनियां-ऐ-फानी से रुखसत हो गया था।

Published by The Seen News Network

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