
डॉक्टर मोहम्मद अल्लामा इक़बाल एक ऐसा नाम जो पूरी दुनिया का बच्चा बच्चा जनता हैं । अल्लामा इक़बाल साहब के शेर हिंदुस्तान और पाकिस्तान ही नहीं बल्कि ईरान और अफगानिस्तान में भी पढ़े जाते हैं। वहा के लोग इन्हें इक़बाल -ए – लाहौर के नाम से जानते हैं । इनका जन्म 9 नवंबर 1877 के सियालकोट के पंजाब में हुआ। इनके वालिद का नाम शेख़ नूर मोहम्मद और इनके वालिदा का नाम इमाम बीबी था।
डॉक्टर अल्लामा इक़बाल साहब ने अपनी पढ़ाई ब्रिटेन और जर्मनी से पूरी की और जब हिंदुस्तान वापस लौटे तो उस समय अंग्रेजो का पूरी तरह से हिंदुस्तान पर कब्ज़ा किया था। तो उन्होंने ने हिन्दुस्तानियों को मैसेज शेर के रूप में दिया.. की
वतन की फ़िक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
ना संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में
• अल्लामा इक़बाल साहब के बेहतरीन शेरों, गजलों और नज्मों से प्रभावित होकर अंग्रेजो ने अल्लामा साहब को ‘सर‘ की उपाधि से नवाजा.
• अल्लामा का मतलब होता हैं ( महाज्ञानी)
• मोहम्मद इक़बाल को अल्लमा इकबाल, विद्वान् इक़बाल , मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान ( पाकिस्तान का विचारक ) शायर-ए-मशरीक (पूरब का शायर) और हकीम-उल-उम्मत ( उम्मा का विद्वान् ) जैसे बड़े नामों से जाना जाता है।
• भारत और पकिस्तान के बटवारे का विचार सबसे पहले अल्लामा इक़बाल साहब ने ही दिया था।
अविभाजित हिंदुस्तान के इक़बाल.
अविभाजित हिंदुस्तान के मशहूर शायर और विद्वान् अल्लामा इक़बाल ने पहले तराना- ए – हिंद लिखा सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा और लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी जैसी गीत लिखा ।
फिर अल्लामा इक़बाल साहब ने कुछ चीजों से प्रभावित होकर पुरी तरह से इस्लाम का रहनुमाई करने लगे और भटके हुए कौम को रास्ते पर लाने की कोशिश में लगे रहे और फिर इन्होंने ने तराना-ए- मिल्ली लिखा चीन -ओ- अरब हमारा हिंदोस्ता हमारा मुस्लिम हैं वतन सारा जहां हमारा. जैसे तराना लिख कर कौम के अंदर जान डाल दिया।
नबिए पाक सल्लाहो अलैहि वसल्लम के दिन और अल्लाह के बताए रास्ते को इन्होंने ने बखूबी आगे बढ़ाया और कौम में फैली बुरी चीजों को मिटाया और सच्चाई को अपनाने को कहा । और कौम को एक बड़ा मैसेज दिया ..
की मोहम्मद से वफ़ा तूने तो हम तेरे हैं
ये जहां क्या चीज़ है लौह-ओ-कलम तेरे हैं
जो आज ये शेर सदी का सबसे बड़ा शेर हैं और कयामत तक रहेगा। आज ही के दिन यानी 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में डॉक्टर मोहम्मद अल्लामा इक़बाल साहब ने दुनियां -ए-फानी को अलविदा कह दिया था।
