शाद अज़ीमाबादी उर्दू ग़ज़ल के त्रिमूर्ति क्यों कहें जाते हैं ?

शाद अज़ीमाबादी

शाद अज़ीमाबादी : उर्दू ग़ज़ल के वह चमकते सितारे हैं जिसे उर्दू ग़ज़ल का त्रिमूर्ति कहा जाता हैं । त्रिमूर्ति का मतलब ये है कि मीर तकी मीर, मिर्ज़ा गालिब और शाद अज़ीमाबादी यानि इन तीनों से मिलकर त्रिमूर्ति बनता हैं।

इनका जन्म 1846 में अजीमाबाद ( पटना) में रईस खानदान में हुआ था। इनका असली नाम सय्यद अली मोहम्मद था। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे।

शाद अज़ीमाबादी उर्दू के बड़े अहम शायर, इतिहासकार, विद्वान्, शोधकर्ता थे। इन्होंने ने गज़ल को नए सिरे से लोगो तक पहुंचाया, आप इनकी शख्सियत का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं की ” सरफरोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं देखना है ज़ोर कितना बाजू–ए– कातिल में हैं” लिखने वाले बिस्मिल अज़ीमाबादी इनके शिष्य थे।

शाद अज़ीमाबादी ने अपनी पूरी जिंदगी उर्दू ग़ज़ल को संवारने में लगा दिया, इस दौरान इन्होने अपने जिंदगी के बुरे दौर भी गुजारे। बीमारियों और उस दौर के विरोधियों को झेलते हुए 8 जनवरी 1927 को ये दुनियां–ए–फानी से रुखसत हो गए।

शाद अज़ीमाबादी के मशहूर शेर और गजलें।

• तमन्नाओं में उलझाया गया हूं खिलौने दे के बहलाया गया हूं

हूं इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह इधर से मुद्दातों से आया गया हूं

• अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया।
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया।।

• ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है।
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।।

• परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका
गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें।।

• तस्कीन तो होती थी तस्कीन न होने से।
रोना भी नहीं आता हर वक़्त के रोने से।।

• सुनी हिकायत-ए-हस्ती तो दरमियाँ से सुनी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मा’लूम

Published by The Seen News Network

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