
हफीज जौनपुरी : इनका असली नाम हफीज मोहम्मद अली था इनका जन्म 1865 में जौनपुर में हुआ था। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे । अपनी ग़ज़ल
“बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है” के लिए जाने जाते हैं।
आइए जानते हैं इनके 10 बड़े शेर
• सुब्ह को आए हो निकले शाम के
जाओ भी अब तुम मिरे किस काम के
हाथा-पाई से यही मतलब भी था
कोई मुँह चूमे कलाई थाम के
तुम अगर चाहो तो कुछ मुश्किल नहीं
ढंग सौ हैं नामा-ओ-पैग़ाम के
• पी कर दो घूँट देख ज़ाहिद
क्या तुझ से कहूँ शराब क्या है
• बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा
चले आओ इक दिन टहलते हुए
• आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़
• हमें याद रखना हमें याद करना
अगर कोई ताज़ा सितम याद आए
• बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए
लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए
• क़ैद में इतना ज़माना हो गया
अब क़फ़स भी आशियाना हो गया
• पहुँचे उस को सलाम मेरा
भूले से न ले जो नाम मेरा
• पी लो दो घूँट कि साक़ी की रहे बात ‘हफ़ीज़’
साफ़ इंकार से ख़ातिर-शिकनी होती है
• साथ रहते इतनी मुद्दत हो गई
दर्द को दिल से मोहब्बत हो गई
दिल की गाहक अच्छी सूरत हो गई
आँख मिलते ही मोहब्बत हो गई
