
उसके बाद मजरूह साहब को म्यूजिक सीखने का शौक चढ़ा तो उन्होंने एक म्यूजिक कॉलेज में एडमिशन ले लिए किंतु इनके पिता जी को ये अच्छा ना लगा । जिसके कारण उन्हें ये शौक भी छोड़ना पड़ा।
उसके बाद मजरूह सुल्तानपुरी ने 1935 में शायरी शुरू कर दी इनका तरन्नुम बेहतरीन होने के कारण इनको बड़े शायरों से तवज्जों मिलने लगा। राज मुरादाबादी और खुमार बाराबंकी जैसे शायर इनको मुशायरे का रोशनी बताने लगे।
कई बड़े फिल्मों के लिए गाने लिखे
एक बार मजरूह सुल्तानपुरी मुंबई के एक मुशायरे में थे तभी फिल्म निर्माता एआर कारदार ने उन्हें अपने फिल्मों के लिए गाने लिखने के लिए ऑफर किया किंतु मजरूह ने माना कर दिया फिर बाद में जिगर मुरादाबादी के कहने पर इन्होंने ने गीत लिखना शुरू कर दिया।
मजरूह साहब के लिखे गीत . ‘आरज़ू’ के सभी गीत सुपरहिट हुए. ‘ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल, जहां कोई न हो’, ‘जाना न दिल से दूर’, ‘आंखों से दूर जाकर’, ‘कहां तक हम उठाएं गम’ और ‘जाओ सिधारो हे राधे के श्याम’ जैसी सुपर हिट गीत लिखे।

सुल्तानपुरी।
हक़ की लड़ाई के लिए नेहरू सरकार ने इन्हे जेल में बंद करा दिया।
मजरूह सुल्तानपुरी: मजरूह सुल्तानपुरी 1 अक्टूबर 1919 को सुल्तानपुर में पैदा हुए थे। इनका असल नाम असरार हसन खान था इनके वालिद का नाम मोहम्मद हसन ख़ान था । मजरूह अपने वालिद के इकलौते बेटे थे। इस दौरान अंग्रेज़ी हुकमत थी । इनके पिता जी ने इनका दाखिला एक मदरसे में करा दिया जहां से इन्होंने ने उर्दू और अरबी पढ़ना लिखना सीखा । उसके कुछ साल बाद मजरूह ने एक बड़े कॉलेज से हकीम की डिग्री हासिल की और एक कस्बे में हकीम का काम करने लगे । उसी दौरान उन्हें एक लड़की से इश्क़ हो गया और बात जब रुसवाई तक पहुंची तो मजरूह साहब को वो कस्बा छोड़कर जाना पड़ा।
उस दौर में मजरूह साहब का कैरियर उरूज पर था । जहां फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक गीत लिख रहे थे। तभी मुंबई में मजदूरों का हड़ताल हो गया वहां पर मजरूह साहब ने एक ऐसा गीत पढ़ा जो की नेहरू सरकार ने मजरूह को सीधा जेल पहुंचा दिया। जेल से बाहर आने के लिए सरकार ने कहा कि अपना गीत वापस ले लो आपको जेल से रिहा कर दिया जाएगा किंतु मजरूह साहब को अपना कलम झुकना गवारा ना समझा इसके बदले में उन्हें 2 साल की सज़ा सुनाई गई ।
सत्ता के सीने पर चढ़कर इंकलाब का ज़ोर लोगो के अंदर पैदा करने लगे। उन्हें इंकलाबी शायर के तौर पर जाने जाना लगा। इनके एक शेर को जो आज का बच्चा बच्चा पढ़ता हैं।
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।
इन्होंने ने ग़ज़ल और शेर को अपने अंदाज़ में तराशा और लोगो तक पहुंचाया। दर्जनों देशों का दौरा किया। आज ही के दिन 24 मई 2000 को फेफड़े का मरीज़ होने के कारण मुंबई के एक अस्पताल में दुनियां को अलविदा कह दिया था।
ऐसे महान शायर को All Poetry Is Here कि तरफ़ से उन्हें अकीदत– ए–खिराज पेश करता हैं।
