
मोहम्मद इब्राहिम जौक : एक दौर था जब उर्दू शायरी के सबसे बड़े शायर कहे जाते थे जौक यहां तक कि मिर्ज़ा ग़ालिब और मोमिन खां मोमिन से बड़े शायर माने जाते थे । ज़ौक जिस भी दरबार में जाते थे शेर पढ़ने के लिए वहां के लोग इनके दीवाने हो जाते थे और इनका लोहा हर कोई मानता था। लेकिन वक्त ने करवट लिया और इन्हे गुमनामी में डाल दिया कुछ लोगो ने तो यहां तक कह दिया की ग़ालिब के साथ इनका नाम तक नहीं लिया जा सकता हैं। आज भले ही गालिब जितना पहचान ना मिल पाई हो लेकिन इनकी शायरी किसी बेहतरीन शायर से कम भी नहीं हैं। इनकी शायरी रूहानियत को एहसास कराती हैं.!
1. अब तो कहते हैं घबराके मर जायेंगे मर के भी चैन नहीं पाया तो किधर जायेंगे
2. तुम भूल कर भी याद नहीं करते हों कभी हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके।
3. जाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यों क्या डेढ़ चुल्लू पानी में मेरा ईमान बह गया।
4. वक्त ए पीरी शबाब की बाते ऐसे हैं जैसे ख़्वाब की बाते।
सुनते हैं उसको छेड़ छेड़ कर हम किस मज़े से इताब की बाते ।
5. मालूम जो हमे होता अंजाम ए मोहब्बत लेते ना कभी भूल कर हम नाम ए मोहब्बत
6. हम रोने पर आ जाए तो दरिया ही बहा दे शबनम की तरह से हमे रोना नहीं आता।
7. तू जान हैं हमारी और जान हैं सब कुछ ईमान ही कहेंगे ईमान हैं तो सब कुछ।
