मुफ्ती सलमान अज़हरी ने यति नर्शिंघा नंद का चुनौती किया स्वीकार। और कहां अगला पिछला हिसाब किया जायेगा बराबर। 17 जून का हैं इंतजार

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मुफ्ती सलमान अज़हरी

शेर– ए– अहले सुन्नत , मुहाफिज – ए – नमूसे रिसालत, खलीफा –ए – हुज़ूर ताज्जुसरीया , शेर –ए– हिंदुस्तान हज़रत अल्लामा व मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सलमान अज़हरी ने किया एलान यति नरशिंघा नंद के चुनौती को किया स्वीकार । 17 जून को होगा महामुकाबला ।

जैसा कि आप सब जानते ही होंगे की बीते कुछ सालों से मुफ्ती सलमान अजहरी और नरशिंघा नंद के बीच में कई बार मुकाबले की बात सामने आई लेकिन नरशिंघा नंद को पीछे हटना पड़ा । ऐसा ही एक मौका और आया हैं बीते दिनों नुपुर शर्मा ने आका– ए – सरवरे कायनात के बारे में अपशब्द का उपयोग किया जिससे देश का मौहौल खराब हो गया हैं देश ही नहीं बल्कि ईरान, इराक सऊदी अरब, कुवैत, दुबई , अफगानिस्तान जैसे तमाम मुल्क भारत के खिलाफ हो गए हैं । और ये देश लगातार हिंदुस्तान पर दबाव बना कर रखा हैं…

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मौत पर कहीं गई शायरों की शायरी!

इस दुनियां में जो भी आयेगा या जो आया हैं उसे एक न एक दिन यहां से जाना पड़ेगा। इस दुनियां में मौत ही सबसे बड़ा सत्य हैं। और मौत से कोई नहीं बच सकता ।

इसी मौत पर कहीं गई शायरों की शायरी आइए जानते है ।

ये मौत तेरी आगोश में एक दिन खो जायेंगे । दो गज जमीं ओढ़कर हम भी सो जायेंगे । ~KS Siddiqui

आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती

~अकबर इलाहाबादी

मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

~मिर्ज़ा गालिब

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते

~शाकिब लखनवी

मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं

~फिराक गोरखपुरी

ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है
मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

~अम्र लखनवी

शुक्रिया ऐ क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया
अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम

~कमर जलालवी

मीराजी के 7 गजलें और शेर ।

• नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया

क्या भूला कैसे भूला क्यूँ पूछते हो बस यूँ समझो
कारन दोश नहीं है कोई भूला भाला भूल गया

कैसे दिन थे कैसी रातें कैसी बातें घातें थीं
मन बालक है पहले प्यार का सुंदर सपना भूल गया

• ज़िंदगी एक अज़िय्यत है मुझे
तुझ से मिलने की ज़रूरत है मुझे

दिल में हर लहज़ा है सिर्फ़ एक ख़याल
तुझ से किस दर्जा मोहब्बत है मुझे

तिरी सूरत तिरी ज़ुल्फ़ें मल्बूस
बस इन्ही चीज़ों से रग़बत है मुझे

• दीदा-ए-अश्क-बार है अपना
और दिल बे-क़रार है अपना

रश्क-ए-सहरा है घर की वीरानी
यही रंग-ए-बहार है अपना

चश्म-ए-गिर्यां से चाक-ए-दामाँ से
हाल सब आश्कार है अपना

• जैसे होती आई है वैसे बसर हो जाएगी
ज़िंदगी अब मुख़्तसर से मुख़्तसर हो जाएगी

• दो पल की थी अंधी जवानी नादानी की भर पाया
उम्र भला क्यूँ बीते सारी रो रो कर पछताने में

• एक ठिकाना आगे आगे पीछे एक मुसाफ़िर है
चलते चलते साँस जो टूटे मंज़िल का एलान करें

• ग़म के भरोसे क्या कुछ छोड़ा क्या अब तुम से बयान करें
ग़म भी रास न आया दिल को और ही कुछ सामान करें

जव्वाद शैख के 6 मशहूर गजलें और शेर।

ज़व्वाद शैख

अपने ताज़ा लबों– लहज़ा के मशहूर पाकिस्तानी शायर जव्वाद शैख जिनके शायरी हिंदुस्तान और पाकिस्तान में काफ़ी फेमस हैं । इनका जन्म 26 मई 1985 को सरगोंधा पाकिस्तान में हुआ था। ये अपने शायरी से लोगो के दिलों में अच्छा खासा अपना मकान बना लिया हैं। तो आइए जानते है इनके कुछ शेर।

• कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है

तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती
तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है

कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है
एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है

यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है
लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है।

• टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे
कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे

तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही??
चर्ख़ को देखने वाली!! तिरा चर्ख़ा टूटे

अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक??
एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे

कोई टुकड़ा तिरी आँखों में न चुभ जाए कहीं
दूर हो जा कि मिरे ख़्वाब का शीशा टूटे।

• अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ
जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं।।

• क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब
थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए।।

• अब मिरा ध्यान कहीं और चला जाता है
अब कोई फ़िल्म मुकम्मल नहीं देखी जाती।।

• कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है??
एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है।।

दाग़ देलहवी उर्दू के लोकप्रिय शायर होने के साथ हुस्न के बड़े दीवाने भी थे।

दाग देलहवी

दाग देलहवी: दाग देलहवी का असली नाम नवाब मिर्ज़ा ख़ान था इनका जन्म 25 मई 1831 को दिल्ली में हुआ था। इनके वालिद का नाम नवाब शमशुद्दीन था। जब देलहवी 4 साल के थे तो इनके वालिद को विलियम फ्रेजर के हत्या के आरोप में फांसी दे दिया गया था।

दाग देलहवी ने 15 वर्ष में ही अपने खाला के बेटी से शादी कर लिया था। उसके बाद इनको लाल किला में पढ़ाई और रहने की व्यवस्था की गई , वही पर इनकी मुलाकात शायर शेख़ इब्राहिम जौक से होती है ये उनको उस्ताद मान लेते है। और उनसे ही शुरआती शायरी सीखी और शेर कहने लगे।

दाग देलहवी पत्थर के हुस्न के भी दीवाने होने लगे.

लाल क़िला में इनकी जिंदगी आराम से गुजरने लगी तो इनके अंदर यौन इच्छाएं जागने लगी, और इसकी पूर्ति के लिए दाग देलहवी ने तवायफों से संबंध बनाने लगे धीरे धीरे दाग को माहौल ने हुस्न परस्त और बदकार बना दिया। वो खूबसूरत चेहरे के दीवाने होने लगे । चाहे वो खूबसूरती पत्थर में ही क्यों ना हों .. दाग एक शेर में फरमाते हैं की .. “बुत ही पत्थर के क्यों ना हो ये दाग अच्छी सूरत को देखता हु मै”

दुनियां भर में दाग के हजारों शागिर्द हुए.।

14 साल लाल किला में रहने के बाद हैदराबाद में आकर बस गए । दाग ने हजारों गजलें और शेर कहें। दुनियां भर में इनकी लोकप्रियता बढ़ने लगीं। लोग इनके शागिर्द बनने लगे . अल्लामा इक़बाल, जिगर मुरादाबादी , नूर नरहवी, बेखुद देलहवी और हसन बरेलवी जैसे शायर इनके शागिर्द थे।

दाग देलहवी के ग़ज़ल और शेर।

• ग़ज़ब किया तिरे वअ’दे पे ए’तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

किसी तरह जो न उस बुत ने ए’तिबार किया
मिरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया

हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लियाँ मुझे दे दे के बे-क़रार किया

• तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

• हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के ‘दाग़’
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

• वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

• मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

• आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले

• हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना

• सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

• लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे

• ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

• आप का ए’तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे

• जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

• उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है

• ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

• ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं
इस दिल को क्या करूँ ये बहलता कहीं नहीं

• आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा

मजरूह सुल्तानपुरी के 11 मशहूर ग़ज़ल और शेर।

मजरूह सुल्तानपुरी

दोस्तों मजरूह सुल्तानपुरी को कौन नहीं जानता बीसवीं शताब्दी के मशहूर शायर थे । बॉलीवुड में गाना लिखने से लेकर से लेकर इंकलाब तक के लिए जाने जाते हैं।

आइए जानते हैं मजरूह सुल्तानपुरी के मशहूर 11 शेर।

1. जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले

दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले

हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही
वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले

2. कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा

शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा

क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा।

3. हमारे बा’द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेगी न जाने हम कहाँ होंगे

इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम जाएगी दुनिया
मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे

न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी
हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे।

4. मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।।

5. बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते।

6. बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते।।

7. ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे।।

8. ‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ।।

9. बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने
ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके।।

10. गुलों से भी न हुआ जो मिरा पता देते
सबा उड़ाती फिरी ख़ाक आशियाने की।।

11. ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं।।

Majrooh Sultanpuri : मजरूह सुल्तानपुरी अपने इंकलाबी शायरी की वजह से कई साल जेल में बिताई।

मजरूह सुल्तानपुरी

उसके बाद मजरूह साहब को म्यूजिक सीखने का शौक चढ़ा तो उन्होंने एक म्यूजिक कॉलेज में एडमिशन ले लिए किंतु इनके पिता जी को ये अच्छा ना लगा । जिसके कारण उन्हें ये शौक भी छोड़ना पड़ा।

उसके बाद मजरूह सुल्तानपुरी ने 1935 में शायरी शुरू कर दी इनका तरन्नुम बेहतरीन होने के कारण इनको बड़े शायरों से तवज्जों मिलने लगा। राज मुरादाबादी और खुमार बाराबंकी जैसे शायर इनको मुशायरे का रोशनी बताने लगे।

कई बड़े फिल्मों के लिए गाने लिखे

एक बार मजरूह सुल्तानपुरी मुंबई के एक मुशायरे में थे तभी फिल्म निर्माता एआर कारदार ने उन्हें अपने फिल्मों के लिए गाने लिखने के लिए ऑफर किया किंतु मजरूह ने माना कर दिया फिर बाद में जिगर मुरादाबादी के कहने पर इन्होंने ने गीत लिखना शुरू कर दिया।

मजरूह साहब के लिखे गीत . ‘आरज़ू’ के सभी गीत सुपरहिट हुए. ‘ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल, जहां कोई न हो’, ‘जाना न दिल से दूर’, ‘आंखों से दूर जाकर’, ‘कहां तक हम उठाएं गम’ और ‘जाओ सिधारो हे राधे के श्याम’ जैसी सुपर हिट गीत लिखे।

मोहम्मद रफ़ी लता मंगेशकर के साथ मजरूह
सुल्तानपुरी।

हक़ की लड़ाई के लिए नेहरू सरकार ने इन्हे जेल में बंद करा दिया।

मजरूह सुल्तानपुरी: मजरूह सुल्तानपुरी 1 अक्टूबर 1919 को सुल्तानपुर में पैदा हुए थे। इनका असल नाम असरार हसन खान था इनके वालिद का नाम मोहम्मद हसन ख़ान था । मजरूह अपने वालिद के इकलौते बेटे थे। इस दौरान अंग्रेज़ी हुकमत थी । इनके पिता जी ने इनका दाखिला एक मदरसे में करा दिया जहां से इन्होंने ने उर्दू और अरबी पढ़ना लिखना सीखा । उसके कुछ साल बाद मजरूह ने एक बड़े कॉलेज से हकीम की डिग्री हासिल की और एक कस्बे में हकीम का काम करने लगे । उसी दौरान उन्हें एक लड़की से इश्क़ हो गया और बात जब रुसवाई तक पहुंची तो मजरूह साहब को वो कस्बा छोड़कर जाना पड़ा।

उस दौर में मजरूह साहब का कैरियर उरूज पर था । जहां फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक गीत लिख रहे थे। तभी मुंबई में मजदूरों का हड़ताल हो गया वहां पर मजरूह साहब ने एक ऐसा गीत पढ़ा जो की नेहरू सरकार ने मजरूह को सीधा जेल पहुंचा दिया। जेल से बाहर आने के लिए सरकार ने कहा कि अपना गीत वापस ले लो आपको जेल से रिहा कर दिया जाएगा किंतु मजरूह साहब को अपना कलम झुकना गवारा ना समझा इसके बदले में उन्हें 2 साल की सज़ा सुनाई गई ।

सत्ता के सीने पर चढ़कर इंकलाब का ज़ोर लोगो के अंदर पैदा करने लगे। उन्हें इंकलाबी शायर के तौर पर जाने जाना लगा। इनके एक शेर को जो आज का बच्चा बच्चा पढ़ता हैं।

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

इन्होंने ने ग़ज़ल और शेर को अपने अंदाज़ में तराशा और लोगो तक पहुंचाया। दर्जनों देशों का दौरा किया। आज ही के दिन 24 मई 2000 को फेफड़े का मरीज़ होने के कारण मुंबई के एक अस्पताल में दुनियां को अलविदा कह दिया था।

ऐसे महान शायर को All Poetry Is Here कि तरफ़ से उन्हें अकीदत– ए–खिराज पेश करता हैं।

https://www.tsnnnews.com/2022/10/t20-world-cup-2022-20.html

हफीज जौनपुरी के टॉप 10 शेर।

हफीज जौनपुरी

हफीज जौनपुरी : इनका असली नाम हफीज मोहम्मद अली था इनका जन्म 1865 में जौनपुर में हुआ था। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे । अपनी ग़ज़ल

“बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है” के लिए जाने जाते हैं।

आइए जानते हैं इनके 10 बड़े शेर

• सुब्ह को आए हो निकले शाम के
जाओ भी अब तुम मिरे किस काम के

हाथा-पाई से यही मतलब भी था
कोई मुँह चूमे कलाई थाम के

तुम अगर चाहो तो कुछ मुश्किल नहीं
ढंग सौ हैं नामा-ओ-पैग़ाम के


• पी कर दो घूँट देख ज़ाहिद
क्या तुझ से कहूँ शराब क्या है

• बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा
चले आओ इक दिन टहलते हुए

• आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़

• हमें याद रखना हमें याद करना
अगर कोई ताज़ा सितम याद आए

• बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए
लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए


• क़ैद में इतना ज़माना हो गया
अब क़फ़स भी आशियाना हो गया


• पहुँचे उस को सलाम मेरा
भूले से न ले जो नाम मेरा


• पी लो दो घूँट कि साक़ी की रहे बात ‘हफ़ीज़’
साफ़ इंकार से ख़ातिर-शिकनी होती है


• साथ रहते इतनी मुद्दत हो गई
दर्द को दिल से मोहब्बत हो गई

दिल की गाहक अच्छी सूरत हो गई
आँख मिलते ही मोहब्बत हो गई

शाद अज़ीमाबादी उर्दू ग़ज़ल के त्रिमूर्ति क्यों कहें जाते हैं ?

शाद अज़ीमाबादी

शाद अज़ीमाबादी : उर्दू ग़ज़ल के वह चमकते सितारे हैं जिसे उर्दू ग़ज़ल का त्रिमूर्ति कहा जाता हैं । त्रिमूर्ति का मतलब ये है कि मीर तकी मीर, मिर्ज़ा गालिब और शाद अज़ीमाबादी यानि इन तीनों से मिलकर त्रिमूर्ति बनता हैं।

इनका जन्म 1846 में अजीमाबाद ( पटना) में रईस खानदान में हुआ था। इनका असली नाम सय्यद अली मोहम्मद था। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे।

शाद अज़ीमाबादी उर्दू के बड़े अहम शायर, इतिहासकार, विद्वान्, शोधकर्ता थे। इन्होंने ने गज़ल को नए सिरे से लोगो तक पहुंचाया, आप इनकी शख्सियत का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं की ” सरफरोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं देखना है ज़ोर कितना बाजू–ए– कातिल में हैं” लिखने वाले बिस्मिल अज़ीमाबादी इनके शिष्य थे।

शाद अज़ीमाबादी ने अपनी पूरी जिंदगी उर्दू ग़ज़ल को संवारने में लगा दिया, इस दौरान इन्होने अपने जिंदगी के बुरे दौर भी गुजारे। बीमारियों और उस दौर के विरोधियों को झेलते हुए 8 जनवरी 1927 को ये दुनियां–ए–फानी से रुखसत हो गए।

शाद अज़ीमाबादी के मशहूर शेर और गजलें।

• तमन्नाओं में उलझाया गया हूं खिलौने दे के बहलाया गया हूं

हूं इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह इधर से मुद्दातों से आया गया हूं

• अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया।
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया।।

• ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है।
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।।

• परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका
गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें।।

• तस्कीन तो होती थी तस्कीन न होने से।
रोना भी नहीं आता हर वक़्त के रोने से।।

• सुनी हिकायत-ए-हस्ती तो दरमियाँ से सुनी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मा’लूम

अनीश मुईन: महज़ 27 साल की उम्र में दुनियां की हक़ीक़त समझने वाला शायर ने क्यों की खुदकुशी? अपने सुसाइड नोट में क्या लिखा?

अनीश मुईन

पाकिस्तान के मशहूर शायर अनीश मुईन जिन्होंने कम उम्र में ही शायरी की दुनियां में अपना नाम कमा लिया था। जब ये माइक पर ग़ज़ल पढ़ने आते थे तो लोगो की तालियां रुकने का नाम ही नही लेती थी। ये भी उनका शुक्रिया अदा करते नही थकते थे। इनकी गजलें हालिया जिंदगी की तर्जुमानी करती थी।

जन्म — 1960 मुल्तान, पकिस्तान

मृत्यु— 5फ़रवरी 1986 मुल्तान पकिस्तान

इतना शोहरत मिलने के बाद भी अनीश मुईन बेचैन रहते थे और लोगो से कहते थे की ये दुनियां कुछ भी नही है । एक दिन मरना ही हैं। इनकी शायरी में भी जिंदगी और मौत की जुगलबंदी बखूबी देखने को मिलता हैं।

इक डूबती धड़कन की सदा लोग न सुन लें
कुछ देर को बजने दो ये शहनाई ज़रा और।

~ अनीश मुईन

खुदकुशी करने से पहले सुसाइड नोट भी लिखा जिसका तर्जुमा ये है।

अनीश मुईन का सुसाइड नोट

ख़ुदा आपको हमेशा सलामत रखे।

मेरी इस हरकत की, सिवाए इसके, कोई और वजह नहीं कि मैं ज़िंदगी की यक्सानियत से उकता गया हूं। ज़िंदगी की किताब का जो पन्ना उलटता हूं उस पर वो ही लिखावट नज़र आती है जो पिछले पन्ने में पढ़ चुका होता हूं, इसलिए मैंने ढेर सारे पन्ने छोड़कर वो लिखावट पढ़ने का फैसला किया है जो आखिरी पन्ने पर लिखी हुई है। मुझे न तो घर वालों से शिकायत है न दफ्तर या बाहर वालों से, बल्कि लोगों ने तो मुझे इतनी मुहब्बत की है कि मैं उसके काबिल भी नहीं था। लोगों ने अगर मेरे साथ कोई ज़्यादती की भी है तो या किसी ने मेरा कुछ देना है तो मैं वो माफ करता हूं। खुदा मेरी भी ज़्यादतियों और गुनाहों को माफ फरमाए।

और आखिर में एक खास बात और, वो ये कि आखिर में राहे खुदा में देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है इसलिए मैं अपनी आंखे आई-बैंक को डोनेट करता हूं। मेरे बाद ये आंखे किसी मुस्तहक़ शख्स को लगा दी जाएं तो मेरी रूह को असल मायनों में सुकून हासिल हो सकने की उम्मीद है। मरने के बाद मुझे आपकी दुआओं की पहले से ज़्यादा ज़रूरत रहेगी, अलबत्ता ग़ैर-ज़रूरी रस्मों पर पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है। मैंने कुछ रुपये आमना के पास इसलिए रखवा दिये हैं ताकि इस मौके पर काम आ सकें।

आपका नालायक बेटाअनीस मुईनअस्लम ख़ान बिल्डिंग, मुल्तान

4/2/86

इनके लिखे शेर।

• हमारी मुस्कुराहट पर न जाना।
दिया तो क़ब्र पर भी जल रहा है।

• अंजाम को पहुँचूँगा मैं अंजाम से पहले।
ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और।।

• वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था
पानी पानी कहते कहते डूब गया है।।

• मुमकिन है कि सदियों भी नज़र आए न सूरज
इस बार अंधेरा मिरे अंदर से उठा है।।

• अजब अंदाज़ से ये घर गिरा है
मिरा मलबा मिरे ऊपर गिरा है।

• याद है ‘आनिस’ पहले तुम ख़ुद बिखरे थे
आईने ने तुम से बिखरना सीखा था।।

• मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में
मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है

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