मलिकजादा मंज़ूर अहमद के लिखें मशहूर शेर.

मालिकजादा मंज़ूर अहमद

मलिकजादा मंज़ूर अहमद उर्दू के साहित्य और मुशायरों के प्रसिद्ध शायर थे. इनका जन्म 17 अक्टूबर 1929 में अम्बेडकर नगर यूपी में हुआ था। और इनकी मृत्यु 22 अप्रैल 2016 में हुई। आइए जानते हैं उनके लिखें कुछ मशहूर शेर।

• तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है
वो अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो ऐसा भी हो सकता है

दरवाज़े पर आहट सुन कर उस की तरफ़ क्यूँ ध्यान गया
आने वाली सिर्फ़ हवा हो ऐसा भी हो सकता है

हाल-ए-परेशाँ सुन कर मेरा आँख में उस की आँसू हैं
मैं ने उस से झूट कहा हो ऐसा भी हो सकता है।

• ज़िंदगी में पहले इतनी तो परेशानी न थी
तंग-दामनी थी लेकिन चाक-दामानी न थी

जाम ख़ाली थे मगर मय-ख़ाना तो आबाद था
चश्म-ए-साक़ी में तग़ाफ़ुल था पशीमानी न थी।

• देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें
ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा।

• चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है
जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है।

• अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में
कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे।

• ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए।

Published by The Seen News Network

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