क्यों फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्में CBSE बोर्ड से हटाई गई.? क्या सरकार को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्मों से डर लग रहा था.?

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

CBSE बोर्ड की किताबों से फैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्मों को क्यों निकाला गया ? इसके पीछे क्या वजह हों सकती हैं? आइए जानते हैं. जैसा कि आप सब जानते ही होंगे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को उर्दू शायरी के बड़े शायरों में शामिल हैं फ़ैज़ साहब अल्लामा इक़बाल और मिर्ज़ा गालिब जैसे शायरों में गिने जाता हैं। उनके लिखें ग़ज़ल, शेर या नज़्म हों इंकलाब की बुनियाद रखती हैं।

फ़ैज़ साहब ख़ुद कहा करते थे.

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।।

उर्दू शायरी के नए संथापक जिन्होंने शायरी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया। इन्होंने अक्सर इंकलाबी नज्मों और मजलूमों पर हो रहे अत्याचार को शायरी के रूप में गढ़कर लोगों तक पहुंचाया।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आपने शायरी से सरकार तक बदलने का हुनर रखते थे।

ये बात हैं सन 1951 की जब जुल्म कर रही सरकार का तख्ता पलट करने का इल्ज़ाम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर लगा। और रावलपिंडी साजिश के कारण इनको गिरफ्तार कर लिया। और इन्हे जेल भेज दिया जेल में भी इन्होंने एक से बढ़कर एक इंकलाबी नज्मों को लिखा लगभग 5 साल जेल में बिताने के बाद इनको रिहा किया गया। रिहाई के बाद ये लंदन चले गए फिर ये 1958 में वापस पकिस्तान लौटे तो सरकार में डर पैदा होने लगा की कहीं फिर से तख्ता पलट की कोशिश ना करे इसलिए इनको फिर से जेल में बंद कर दिया गया.

इनके नज्मों के आगे झुकी सरकार..

सन 1985 में पकिस्तान की सरकार ने औरतों को साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी तो एक स्टेडियम में 50 हज़ार से ज्यादा लोगों के सामने औरतों ने फैज़ की मशहूर नज़्म हम देखेंगे को पढ़ा।

हम देखेंगे


लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।।

तो क्या फैज़ की नज्में आने वाले समय में इंकलाब ना लाए इस कारण सरकार को हटाना पड़ा।

अगर देखा जाय तो ज्यादातर फैज़ की नज्में जुल्म के उपर है और उनका यहीं मकसद हैं की जुल्म बढ़े तो जुल्म मिटाने की कोशिश करो , सामने चाहें कितना ही बड़ा तानाशाह हो। बुराई मिटाने की कोशिश करो ।

मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है
मेरे नालों की गुम-शुदा आवाज़

Published by The Seen News Network

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