फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के 10 मशहूर शेर।

विश्व के सबसे प्रख्यात,प्रसिद्ध और इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद जो आपने इंकलाबी विचारधारा की वजह से कई साल जेल में बिताया।

आइए जानते हैं उनके 10 इंकलाबी शेर.

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हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर।

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बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले।।

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और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया।।

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दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के।

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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।।

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तुझे पुकारा है बे-इरादा
जो दिल दुखा है बहुत ज़ियादा

नदीम हो तेरा हर्फ़-ए-शीरीं
तो रंग पर आए रंग-ए-बादा।।

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सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं।

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दर्द थम जाएगा ग़म न कर, ग़म न कर
यार लौट आएँगे, दिल ठहर जाएगा, ग़म न कर, ग़म न कर
ज़ख़्म भर जाएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
दिन निकल आएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
अब्र खुल जाएगा, रात ढल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर
रुत बदल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर।।

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जुनूँ की याद मनाओ कि जश्न का दिन है
सलीब-ओ-दार सजाओ कि जश्न का दिन है

तरब की बज़्म है बदलो दिलों के पैराहन
जिगर के चाक सिलाओ कि जश्न का दिन है

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मर जाएँगे ज़ालिम की हिमायत न करेंगे
अहरार कभी तर्क-ए-रिवायत न करेंगे।

क्या कुछ न मिला है जो कभी तुझ से मिलेगा
अब तेरे न मिलने की शिकायत न करेंगे।।

Published by The Seen News Network

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