कैफ़ी आज़मी Death Anniversary : कैफ़ी आज़मी के रुहानी शेर आइए जानते हैं..

कैफ़ी आज़मी साहब

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।।

जी हां हम आज बात करने वाले हैं ऊर्दू शायरी के मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी के बारे में कैफ़ी आज़मी साहब का असली नाम सय्यद अतहर हुसैन रिज़वी था इनका जन्म 14 जनवरी 1918 को आजमगढ़ में हुआ । ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे ये अपने नज्मों से इंकलाब लाने की ताकत रखते थे। कैफ़ी साहब ने हीर रांझा, काग़ज़ के फूल , हक़ीक़त जैसी मशहूर फिल्मों के लिए गाने लिखे। फिल्मी दुनियां और मुशायरों की दुनियां में बड़े से बड़े सम्मानों से नवाजे गए। आज ही के दिन 10 मई 2002 को दुनियां का ये चमकता सितारा दुनियां -ए -फानी से रुखसत हों गया था। आइए जानते है इनके लिखे मशहूर शेर..

• बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए।
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए।।

• रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई।
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।।

• गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो।
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ।

• पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था।
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा।

• जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क।
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े।।

• तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो।
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो।

• इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े।।

• रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती में समा जाते हैं।

Published by The Seen News Network

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