
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा लखनऊ के बेहद ही गर्म मिजाज़ के शायर माने जाते हैं। ये मीर तकी मीर के समकालीन शायर थे। इन्होंने ऊर्दू शायरी में “रेख्ती” विधा का शुरुआत किया। और एक से बढ़कर एक कलाम लिखें जो आज भी लोगो के जुबां पर रहता है।
जन्म- 1752 मुर्शिदाबाद, भारत
मृत्य- 1 मई 1817 दिल्ली
आइए जानते हैं इनके लिखे हुए कुछ शेर..
• क्या हँसी आती है मुझ को हज़रत-ए-इंसान पर।
फ़ेल-ए-बद ख़ुद ही करें लानत करें शैतान पर।।
• चाहता हूँ तुझे नबी की क़सम।
हज़रत-ए-मुर्तज़ा-अली की क़सम
मुझे ग़मगीं न छोड़ रोता आज।
तुझे अपनी हँसी-ख़ुशी की क़सम।।
• कुछ इशारा जो किया हम ने मुलाक़ात के वक़्त।
टाल कर कहने लगे दिन है अभी रात के वक़्त।।
• अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है।
कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है।।
• कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं।
बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं।।
• ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है।
ये आग इश्क़ की या-रब किधर से उतरी है।।
• हज़ार शैख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन की सी।
मगर वो बात कहाँ मौलवी मदन की सी।।
