मुनव्वर राणा इस सदी के सबसे बड़े शायर क्यों कहें जाते हैं.?

मुनव्वर राणा और उनकी मां

इस सदी के सबसे बड़े शायर मुनव्वर राणा जिन्होंने इस दौर में बता दिया की शेर और ग़ज़ल महबूब के जुल्फों और उसके हुस्न पर नहीं बल्कि मां के झुर्रियां भरे चेहरे, नम आंखों, और मैले आंचल पर भी होता हैं। इनके शेर में बखूबी मां का दर्द मां का ममता देखने को मिलता हैं ।

मां पर शेर कहना इतना आसान नहीं था..

ये बात हैं उस दौर की जब लोग हुस्न के दीवाने हुआ करते थे शेर और गजलें सिर्फ़ महबूब के जुल्फों और उसके चेहरे तक ही सीमित थी। हर शायर इन्ही पर शेर कहते थे। लेकिन उस दौर में मुनव्वर राना साहब आपने शेर और गजलों को नया रूप दिया और शेर और गज़लों को ‘कोठे से घसीट कर मां आंचल तक लाए‘ और फिर क्या था हिन्दुस्तान से लेकर दुबई तक उनके शेर की धूम मच गई। और इनकी सफलता रातों रात बालंदी पर पहुंच गई।

मां पर लिखें इनके बेहतरीन शेर..

• चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है।
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।।

• अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा।
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है।।

• इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है।
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है।।

• जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है।
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।।

• कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में।
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है।।

• तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक।
मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी।।

• मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना।
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती।।

• ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ।
इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा।।

• ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता।
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है।।

• शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ ।
माँ की उँगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा।।

Published by The Seen News Network

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