
डॉ. बशीर बद्र उर्दू शायरी के महान शायरों में शामिल हैं इनकी ग़ज़ले देश हो या विदेश हर जगह धूम मचाती है। मोहब्बत करने वाले इनके शेर को पढ़े बिना मोहब्बत को अधूरा समझते हैं। कहा जाता है की जब बशीर बद्र शेर लिखने बैठते थे तो आपने जहन के उस गहराई में जाकर शेर निकाल लाते थे जो सीधा रूह का ताल्लुक़ रखती हैं।
डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फ़रवरी 1935 को कानपुर में पैदा हुए। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे। इनकी उम्र जब 20 वर्ष थी तभी इनकी लिखी ग़ज़ले हिन्दुस्तान और पकिस्तान में प्रकाशित होने लगीं ।
इनके शेर को प्रधान मंत्री इंद्रा गांधी ने भी पढ़ा…
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।।
बशीर बद्र उर्दू ग़ज़ल को नई पहचान दिलाई
बशीर बद्र ने अपने गज़लों में नए नए शब्दों को सामिल कर के पुरी की पुरी नई ग़ज़ल ही कहने की कोशिश की और कामयाब रहें। इन्होने महबूब का हुस्न हों या मजलूम का दर्द दोनों को साथ में पिरोया और लोगों तक पहुंचाया।
• ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं।
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।।
• बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना।
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।।
• हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं।
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में ।।
