फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के 10 मशहूर शेर।

विश्व के सबसे प्रख्यात,प्रसिद्ध और इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद जो आपने इंकलाबी विचारधारा की वजह से कई साल जेल में बिताया।

आइए जानते हैं उनके 10 इंकलाबी शेर.

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर।

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले।।

और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया।।

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के।

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।।

तुझे पुकारा है बे-इरादा
जो दिल दुखा है बहुत ज़ियादा

नदीम हो तेरा हर्फ़-ए-शीरीं
तो रंग पर आए रंग-ए-बादा।।

सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं।

दर्द थम जाएगा ग़म न कर, ग़म न कर
यार लौट आएँगे, दिल ठहर जाएगा, ग़म न कर, ग़म न कर
ज़ख़्म भर जाएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
दिन निकल आएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
अब्र खुल जाएगा, रात ढल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर
रुत बदल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर।।

जुनूँ की याद मनाओ कि जश्न का दिन है
सलीब-ओ-दार सजाओ कि जश्न का दिन है

तरब की बज़्म है बदलो दिलों के पैराहन
जिगर के चाक सिलाओ कि जश्न का दिन है

मर जाएँगे ज़ालिम की हिमायत न करेंगे
अहरार कभी तर्क-ए-रिवायत न करेंगे।

क्या कुछ न मिला है जो कभी तुझ से मिलेगा
अब तेरे न मिलने की शिकायत न करेंगे।।

क्यों फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्में CBSE बोर्ड से हटाई गई.? क्या सरकार को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्मों से डर लग रहा था.?

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

CBSE बोर्ड की किताबों से फैज़ अहमद फ़ैज़ की नज्मों को क्यों निकाला गया ? इसके पीछे क्या वजह हों सकती हैं? आइए जानते हैं. जैसा कि आप सब जानते ही होंगे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को उर्दू शायरी के बड़े शायरों में शामिल हैं फ़ैज़ साहब अल्लामा इक़बाल और मिर्ज़ा गालिब जैसे शायरों में गिने जाता हैं। उनके लिखें ग़ज़ल, शेर या नज़्म हों इंकलाब की बुनियाद रखती हैं।

फ़ैज़ साहब ख़ुद कहा करते थे.

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।।

उर्दू शायरी के नए संथापक जिन्होंने शायरी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया। इन्होंने अक्सर इंकलाबी नज्मों और मजलूमों पर हो रहे अत्याचार को शायरी के रूप में गढ़कर लोगों तक पहुंचाया।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आपने शायरी से सरकार तक बदलने का हुनर रखते थे।

ये बात हैं सन 1951 की जब जुल्म कर रही सरकार का तख्ता पलट करने का इल्ज़ाम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर लगा। और रावलपिंडी साजिश के कारण इनको गिरफ्तार कर लिया। और इन्हे जेल भेज दिया जेल में भी इन्होंने एक से बढ़कर एक इंकलाबी नज्मों को लिखा लगभग 5 साल जेल में बिताने के बाद इनको रिहा किया गया। रिहाई के बाद ये लंदन चले गए फिर ये 1958 में वापस पकिस्तान लौटे तो सरकार में डर पैदा होने लगा की कहीं फिर से तख्ता पलट की कोशिश ना करे इसलिए इनको फिर से जेल में बंद कर दिया गया.

इनके नज्मों के आगे झुकी सरकार..

सन 1985 में पकिस्तान की सरकार ने औरतों को साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी तो एक स्टेडियम में 50 हज़ार से ज्यादा लोगों के सामने औरतों ने फैज़ की मशहूर नज़्म हम देखेंगे को पढ़ा।

हम देखेंगे


लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।।

तो क्या फैज़ की नज्में आने वाले समय में इंकलाब ना लाए इस कारण सरकार को हटाना पड़ा।

अगर देखा जाय तो ज्यादातर फैज़ की नज्में जुल्म के उपर है और उनका यहीं मकसद हैं की जुल्म बढ़े तो जुल्म मिटाने की कोशिश करो , सामने चाहें कितना ही बड़ा तानाशाह हो। बुराई मिटाने की कोशिश करो ।

मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है
मेरे नालों की गुम-शुदा आवाज़

रामधारी सिंह दिनकर को हिंदी काव्य का सबसे बड़ा कवि क्यों कहा जाता हैं? आइए जानते हैं इनके पुण्यतिथि पर कुछ रोचक बातें।

रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर हिंदी साहित्य के सबसे बड़े कवि, लेखक, निबंधकार, और वीर रस के कवि थे । इन्हें हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय कवि कहां जाता हैं। आज़ादी से पहले लिखी गई कविताओं के वजह से विद्रोह के रूप में उभरे।

जन्म – 23 सितंबर 1908 सिमरिया बेगूसराय भारत

मृत्यु – 24 अप्रैल 1974 बेगूसराय बिहार

कार्य – कवि, सांसद के सदस्य, स्वतंत्रता सेनानी, निबंधकार, व्यंगकार, पत्रकार

पुरस्कार- पद्म भूषण, साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ

पत्नी – श्यामवती देवी

इनके प्रमुख रचनाएं..

• जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।।

• है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।।

• आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर, कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।।

• घर-घर देखा धुआँ पर, सुना, विश्व में आग लगी है,
‘जल ही जल’ जन-जन रटता है, कंठ-कंठ में प्यास जगी है।।

• सूख गया रस श्याम गगन का एक घुन विष जग का पीकर,
ऊपर ही ऊपर जल जाते सृष्टि-ताप से पावस सीकर।।

• मनुज-वंश के अश्रु-योग से जिस दिन हुआ सिन्धु-जल खारा,
गिरी ने चीर लिया निज उर, मैं ललक पड़ा लाख जल की धारा।।

अज़ीज़ हामिद मदनी नई उर्दू शायरी के बेहतरीन शायर माने जाते हैं।

अज़ीज़ हामिद मदनी

अज़ीज़ हामिद मदनी नई उर्दू शायरी के प्रतिष्ठित शायर माने जाते हैं । इनकी शायरी नई विषयो के लिए मानी जाती हैं । इनका जन्म भारत में हुआ था लेकिन बटवारे के समय ये पकिस्तान के कराची में जा कर बस गए.

जन्म – 15 जून 1922 रायपुर भारत

मृत्यु – 23 अप्रैल 1991 कराची पकिस्तान

आइए जानते हैं उनके लिखें कुछ मशहूर शेर.

• ताज़ा हवा बहार की दिल का मलाल ले गई
पा-ए-जुनूँ से हल्क़ा-ए-गर्दिश-ए-हाल ले गई

जुरअत-ए-शौक़ के सिवा ख़ल्वतियान-ए-ख़ास को
इक तिरे ग़म की आगही ता-ब-सवाल ले गई।

• माना कि ज़िंदगी में है ज़िद का भी एक मक़ाम
तुम आदमी हो बात तो सुन लो ख़ुदा नहीं।।

• वफ़ा की रात कोई इत्तिफ़ाक़ थी लेकिन
पुकारते हैं मुसाफ़िर को साएबाँ क्या क्या।

• जो बात दिल में थी उस से नहीं कही हम ने
वफ़ा के नाम से वो भी फ़रेब खा जाता।

• बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं
दूर दूर से आने वाले रस्ते कहीं कहीं मिलते हैं।

मलिकजादा मंज़ूर अहमद के लिखें मशहूर शेर.

मालिकजादा मंज़ूर अहमद

मलिकजादा मंज़ूर अहमद उर्दू के साहित्य और मुशायरों के प्रसिद्ध शायर थे. इनका जन्म 17 अक्टूबर 1929 में अम्बेडकर नगर यूपी में हुआ था। और इनकी मृत्यु 22 अप्रैल 2016 में हुई। आइए जानते हैं उनके लिखें कुछ मशहूर शेर।

• तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है
वो अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो ऐसा भी हो सकता है

दरवाज़े पर आहट सुन कर उस की तरफ़ क्यूँ ध्यान गया
आने वाली सिर्फ़ हवा हो ऐसा भी हो सकता है

हाल-ए-परेशाँ सुन कर मेरा आँख में उस की आँसू हैं
मैं ने उस से झूट कहा हो ऐसा भी हो सकता है।

• ज़िंदगी में पहले इतनी तो परेशानी न थी
तंग-दामनी थी लेकिन चाक-दामानी न थी

जाम ख़ाली थे मगर मय-ख़ाना तो आबाद था
चश्म-ए-साक़ी में तग़ाफ़ुल था पशीमानी न थी।

• देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें
ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा।

• चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है
जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है।

• अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में
कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे।

• ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए।

डॉ. अल्लामा इक़बाल के बेहतरीन 21 शेर.

डॉ. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल

पाकिस्तान के राष्ट्र कवि और सदी के सबसे बड़े शायर और विद्वान् डॉ. अल्लामा इक़बाल जिन्होंने विश्व को एक से बढ़कर एक मैसेज अपने शेर के माध्यम से दिया.. आइए जानते है इनके मशहूर 21 शेर.

1.

कि जो मोहम्मद से वफा तूने तो हम तेरे है
ये जहां क्या चीज़ लौह- ओ- कलम तेरे है।।

2.

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा

हम बुलबुले है इसके ये गुलसिता हमारा

3.

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
ज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी।

4.

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

5.

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।

6.

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।

7.

जमीर जाग ही जाता है अगर जिंदा हो इकबाल

कभी गुनाह से पहले तो कभी गुनाह के बाद।

8.

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो।

9.

कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी.
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा.
यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहाँ से.
फिर भी मगर है कायम नामोनिशां हमारा।

10.

ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ये दौर अपने बराहीम की तलाश में है
सनम-कदा है जहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह।

11

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्तां हमारा…
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमार।

12.

दिल में खुदा का होना लाजिम है इकबाल

सजदों में पड़े रहने से जन्नत नहीं मिलती।

13.

बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम
सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा

14.

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।

15.

इल्म में भी सुरूर है लेकिन
ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं।

16.

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।

17.

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है।

18.

हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी
ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़।

19.

हरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक
कुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एक।

20.

मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका।

21.

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है।

डॉ. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के यौमे- ए – वफात पर इनसे जुड़ी को महत्वपूर्ण बातें और शेर.

डॉ. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल

डॉक्टर मोहम्मद अल्लामा इक़बाल एक ऐसा नाम जो पूरी दुनिया का बच्चा बच्चा जनता हैं । अल्लामा इक़बाल साहब के शेर हिंदुस्तान और पाकिस्तान ही नहीं बल्कि ईरान और अफगानिस्तान में भी पढ़े जाते हैं। वहा के लोग इन्हें इक़बाल -ए – लाहौर के नाम से जानते हैं । इनका जन्म 9 नवंबर 1877 के सियालकोट के पंजाब में हुआ। इनके वालिद का नाम शेख़ नूर मोहम्मद और इनके वालिदा का नाम इमाम बीबी था।

डॉक्टर अल्लामा इक़बाल साहब ने अपनी पढ़ाई ब्रिटेन और जर्मनी से पूरी की और जब हिंदुस्तान वापस लौटे तो उस समय अंग्रेजो का पूरी तरह से हिंदुस्तान पर कब्ज़ा किया था। तो उन्होंने ने हिन्दुस्तानियों को मैसेज शेर के रूप में दिया.. की

वतन की फ़िक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में,


ना संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में

• अल्लामा इक़बाल साहब के बेहतरीन शेरों, गजलों और नज्मों से प्रभावित होकर अंग्रेजो ने अल्लामा साहब को ‘सर‘ की उपाधि से नवाजा.

• अल्लामा का मतलब होता हैं ( महाज्ञानी)

• मोहम्मद इक़बाल को अल्लमा इकबाल, विद्वान् इक़बाल , मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान ( पाकिस्तान का विचारक ) शायर-ए-मशरीक (पूरब का शायर) और हकीम-उल-उम्मत ( उम्मा का विद्वान् ) जैसे बड़े नामों से जाना जाता है।

• भारत और पकिस्तान के बटवारे का विचार सबसे पहले अल्लामा इक़बाल साहब ने ही दिया था।

अविभाजित हिंदुस्तान के इक़बाल.

अविभाजित हिंदुस्तान के मशहूर शायर और विद्वान् अल्लामा इक़बाल ने पहले तराना- ए – हिंद लिखा सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा और लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी जैसी गीत लिखा ।

फिर अल्लामा इक़बाल साहब ने कुछ चीजों से प्रभावित होकर पुरी तरह से इस्लाम का रहनुमाई करने लगे और भटके हुए कौम को रास्ते पर लाने की कोशिश में लगे रहे और फिर इन्होंने ने तराना-ए- मिल्ली लिखा चीन -ओ- अरब हमारा हिंदोस्ता हमारा मुस्लिम हैं वतन सारा जहां हमारा. जैसे तराना लिख कर कौम के अंदर जान डाल दिया।

नबिए पाक सल्लाहो अलैहि वसल्लम के दिन और अल्लाह के बताए रास्ते को इन्होंने ने बखूबी आगे बढ़ाया और कौम में फैली बुरी चीजों को मिटाया और सच्चाई को अपनाने को कहा । और कौम को एक बड़ा मैसेज दिया ..

की मोहम्मद से वफ़ा तूने तो हम तेरे हैं

ये जहां क्या चीज़ है लौह-ओ-कलम तेरे हैं

जो आज ये शेर सदी का सबसे बड़ा शेर हैं और कयामत तक रहेगा। आज ही के दिन यानी 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में डॉक्टर मोहम्मद अल्लामा इक़बाल साहब ने दुनियां -ए-फानी को अलविदा कह दिया था।

शकील आज़मी के जन्म दिन पर उनके 10 मशहूर शेर और ग़ज़ले.

शकील आज़मी

हिंदुस्तान के बड़े शायर और गीतकार शकील आज़मी उर्दू अदब के मशहूर शायर हैं इनके लिखे कलाम देश विदेश में पढ़े और सुने जाते हैं ज़मी हिंदुस्तान की हो या दुबई की जब ये अपने कलाम पढ़ते हैं तो तालियों की गड़गड़ाहट दूर तक गूंजती हैं। इनके शेर रूह को अजीब सा सुखन देती हैं और युवाओं को हौसला देती।

10 बड़े शेर शकील आज़मी साहब के

1.

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है

मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर
सँभल के चल तुझे सारा जहान देखता है

कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो
जो इश्क़ करता है कब ख़ानदान देखता है।

2.

चढ़ा हुआ है जो दरिया उतरने वाला है
अब इस कहानी का किरदार मरने वाला है

ये आगही है किसी हादसे के आमद की
बदन का सारा असासा बिखरने वाला है

ज़रा सी देर में ज़ंजीर टूट जाएगी
जुनून अपनी हदों से गुज़रने वाला है

‘शकील’ हम से किसी को शिकायतें हैं बहुत
चलो कोई तो हमें प्यार करने वाला है।

3.

मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल
तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल

तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन
मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल

मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा ‘शकील’
टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल।

4.

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।

5.

अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी खड़े रहना भी
कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े रहना भी।

6.

भूक में इश्क़ की तहज़ीब भी मर जाती है
चाँद आकाश पे थाली की तरह लगता है

7.

हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए
कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए।

8.

फिर यूँ हुआ थकन का नशा और बढ़ गया
आँखों में डूबता हुआ जादा लगा हमें।

9.

अकेले रहने की ख़ुद ही सज़ा क़ुबूल की है
ये हम ने इश्क़ किया है या कोई भूल की है

10.

तुम्हारी मौत ने मारा है जीते-जी हम को
हमारी जान भी गोया तुम्हारी जान में थी

शकील बदायूंनी साहब के मशहूर 15 शेर और ग़ज़ले।

शकील बदायूंनी

उर्दू अदब और मशहूर गीतकार शकील बदायूंनी जिनके शायरी पढ़ने के बाद रूह को नया ताज़गी मिलता हैं और जिंदगी जीने का अलग ही सलीका सीखता हैं। आइए जानते हैं इनके इनके मशहूर शेर और ग़ज़ले।

1.

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का ‘शकील’
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

2.

जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है
हँसी ज़ब्त करने को जी चाहता है

जहाँ इश्क़ में डूब कर रह गए हैं
वहीं फिर उभरने को जी चाहता है

वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं
मगर बात करने को जी चाहता है

गुनाह-ए-मुकर्रर ‘शकील’ अल्लाह अल्लाह
बिगड़ कर सँवरने को जी चाहता है

3.

वो यूँ खो के मुझे पाया करेंगे
मिरा अफ़्साना दोहराया करेंगे

सितम अपने जो याद आया करेंगे
तो दिल ही दिल में पछताया करेंगे

‘शकील’ अपने लिए लम्हात-ए-फ़ुर्सत
पयाम-ए-नौ-ब-नौ लाया करेंगे

4.

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

5.

मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे
ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है

6.

मोहब्बत ही में मिलते हैं शिकायत के मज़े पैहम
मोहब्बत जितनी बढ़ती है शिकायत होती जाती है

7.

तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई ले के हँस दो
आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना।

8.

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ।

9.

वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं
मगर बात करने को जी चाहता है।

10.

मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी
तिरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे।

11.

बुज़-दिली होगी चराग़ों को दिखाना आँखें
अब्र छट जाए तो सूरज से मिलाना आँखें।

12.

कल रात ज़िंदगी से मुलाक़ात हो गई
लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गई।

13.

क्या हसीं ख़्वाब मोहब्बत ने दिखाया था हमें
खुल गई आँख तो ताबीर पे रोना आया।

14.

लम्हे उदास उदास फ़ज़ाएँ घुटी घुटी
दुनिया अगर यही है तो दुनिया से बच के चल

15.

रहमतों से निबाह में गुज़री
उम्र सारी गुनाह में गुज़री।

शकील बदायूंनी के “Death Anniversary” पर इनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें..

शकील बदायूंनी

शकील बदायूंनी एक ऐसा नाम जो हमेशा से हर जुबां पर रहता है। इनके लिखें गीत हो या शेर या इनके कहें गजलें हो हर दौर में फिट बैठता है हर दिन इनके कलाम करोड़ों लोग पढ़ते हैं। इनका जन्म 3 अगस्त 1916 में बदायूं में हुआ इनके पिता “मो. जमाल अहमद सोखता कादरी” जो बदायूं के बेड़े विद्वान, उपदेशक और एक बेहतरीन शायर थे। देखा जाय तो शकील बदायूंनी साहब का खानदान ही शायराना था इनके चाचा भी नात और शेर कहने के मामले में उस्ताद का लकब हासिल था। अपने चाचा के देख रेख में ही इन्होंने ने 14 वर्ष की आयु में ही शेर कहना और लिखना शुरू कर दिया और साथ साथ ही शिक्षा प्राप्त करने मुंबई और अलीगढ़ से पढ़ाई पूरी की।

दो साल के भीतर ही शायरी में अपना अलग नाम बना लिया

सन 1942 से 1944 के बीच शकील बदायूंनी ने अपने शायरी के जलवे बिखेरने लगे लोग इनके लिखे ग़ज़ल

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया

जाने आज क्यों तेरे नाम पर रोना आया

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस क़दर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का ‘शकील’
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

पढ़ कर लोग इनके दीवाने होने लगे ।

शकील बदायूंनी उस समय के सभी मुशायरों में अलग ही रंग जमाते थे जिस कारण से उनका कद भी लोगो को प्रभावित करता था वे मुशायरों के बेहद पॉपुलर शायर थे जिस मुशायरे में होते थे, शाइरी सुनाने के बाद सारा मुशायरा लुटकर ले जाते थे उनके साथ मुशायरों में ‘शेरी भोपाली’, ‘दिल लखनवी’, ‘राज मुरादाबादी’, ‘मजरूह सुल्तानपुरी’, सभी शामिल होते थे । ये सभी इनके हुनर की तारीफ करते थे।

1944 में मुंबई आए और एक से बढ़कर एक गाने लिखे.

शकील बदायूंनी साहब जब मुंबई आए तो इनकी मुलाकात उस समय के बड़े निर्माता कारदार और संगीतकार नौशाद से हुई और फिल्म चौदवी का चांद और मुगले आज़म जैसी फिल्मों के गाने लिखे जो सारे गाने हिट हुए और बॉलीवुड में अपना एक अलग पहचान बनाई। आज के दौर में भी इनके गाने हिट रहते है।. चाहे वो

चौदावी का चांद हो.

जब प्यार किया तो डरना क्या

नन्हा मुन्ना राही हु देश का सिपाही हु

दुनियां में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा

गाए जा गीत मिल के.

इन्हीं सब गानों और शेर के वजह से इन्हें मोहब्बत का शायर कहा जाता हैं।

शकील बदायूंनी साहब उर्दू शायरी में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। जो सदियों तलक लोगों के जहन में गूंजता रहेगा।

आज ही के दिन यानी 20 अप्रैल 1970 को महज़ 54 वर्ष की उम्र में ही ये नायब सितारा दुनियां-ऐ-फानी से रुखसत हो गया था।

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