चांद एक ऐसा चीज है जो हर खूबसूरत चीजों में फिट बैठता है. और हर खूबसूरत चीजों का तुलना चांद से किया जाता है। महबूबा का हुस्न हों या मां का चेहरा हमेशा चांद की तरह चमकता रहता हैं। इन्हीं चीजों को शायरों ने अपने कलम से बखूबी उतरने की कोशिश की । आईए जानते हैं चांद पर कहें गए शायरों के शेर..
• ईद का चाँद तुम ने देख लिया चाँद की ईद हो गई होगी ।।
~इदरीश आज़ाद
• उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
~इफ्तिखार नशीम
• कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा।
~इब्न-ए – इंशा
• मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है।
~ अहमद कमाल
• शम्स का हमनशी आसमा का ताज सितारों के बीच निखरता हुआ ये चांद
आशिकों का जान दिल का अरमान बदलो के बीच छिपाता हुआ ये चांद
आप में से ऐसा कोई ना होगा जो इंकलाब की बाते न करता हों. लेकिन क्या आप जानते हैं की इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा किसने दिया?
अगर नहीं जानते तो मै आप को बताता हू की इंकलाब का नारा किसने दिया। इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा देने वाले कोई और नहीं बल्कि अपने दौर के मशहूर शायर हसरत मोहानी जी ने दिया . हसरत मोहानी का वो ग़ज़ल जिसे अपने कभी न कभी सुना ही होगा जो हर दौर में पढ़ा और सुना जाता हैं.
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।
आप हसरत मोहानी की शख्सियत इसी बात से अंदाजा लगा लीजिए की शायर, महान नेता, सूफ़ी, दरवेश, योद्धा, पत्रकार, आलोचक, शोधकर्ता , मुस्लिम कम्युनिस्ट और जमीयत उलेमा जब ये सब सारे लकब एक साथ होता है तब जा के एक शख्सियत बनता है जिसका नाम हसरत मोहानी होता है।
हसरत मोहानी का पूरा नाम सय्यद फजलुल हसन था ।
इनका जन्म 14 अक्टूबर 1878 के उन्नाव में हुआ था । ये मशहूर स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा और अपने गजलों के लिए जाने जाते है। जब अंग्रेजो ने भारत पर पुरी तरह से कब्ज़ा कर लिया था तो हसरत मोहानी ने ही ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया। और कई सारे आंदोलन किए इन्होने ने गांधी जी का बखूबी साथ दिया। और अंग्रेजो को भारत से भागने में काफ़ी बड़ा योगदान दिया ।
हसरत मोहानी की गजलें और शेर।
• चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़ तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ’तन और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है।।
• नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती।। मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं।।
• आरज़ू तेरी बरक़रार रहे। दिल का क्या है रहा रहा न रहा।।
दोस्तों आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जो सआदत हसन मंटो को ना जानता हो. इन्हें आप सब किसी न किसी तरीके से जानते ही होंगे चाहें बदनामी के वजह से या इनके नाम के वजह से । कहा जाता है की जिंदगी बड़ी नहीं कारनामे बड़े होने चाहिएं। देखा जाय तो मंटो का जिंदगी ज्यादा बड़ी नहीं थी महज़ 42 साल के उम्र में ही दुनियां छोड़ गए थे लेकिन इनकी कहानियों की उम्र हजारों साल जिंदा रहेगी। इन्होने ने जिस तरह से आपने कहानियों को लिखा हैं वो हुबहू समाज में सच्चाई देख कर लिखी थी .
अपने कहानियों के वजह से बदनाम लेखक कहें जाने लगे..
” ठंडा गोश्त” “काली सलवार” और “बू” जैसी कहानी लिखी जिससे इनके उपर औरतों का इज़्जत नीलाम करने और औरतों का इज्जत न करने का आरोप लगा और इनके उपर मुकदमें भी किए गए।
आइए जानते हैं इनके कुछ मशहूर लेख..
• औरत मर्द की मोहब्बत को हवस और अपनी हवस को हमेशा मोहब्बत समझती है।।
• मज़हब जब दिलों से निकलकर दिमाग़ पर चढ़ जाए तो ज़हर बन जाता है।।
• लीडर जब आँसू बहा कर लोगों से कहते हैं कि मज़हब ख़तरे में है तो इस में कोई हक़ीक़त नहीं होती। मज़हब ऐसी चीज़ ही नहीं कि ख़तरे में पड़ सके, अगर किसी बात का ख़तरा है तो वो लीडरों का है जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए मज़हब को ख़तरे में डालते हैं।।
• दुनिया में जितनी लानतें हैं, भूक उनकी माँ है।।
• हिन्दुस्तान को उन लीडरों से बचाओ जो मुल्क की फ़िज़ा बिगाड़ रहे हैं और अवाम को गुमराह कर रहे हैं।।
• हर औरत वेश्या नहीं होती लेकिन हर वेश्या औरत होती है। इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए।।
• जिस्म दाग़ा जा सकता है मगर रूह नहीं दाग़ी जा सकती।।
• वेश्या पैदा नहीं होती, बनाई जाती है, या ख़ुद बनती है।।
मैं सोचता हूँ अगर बंदर से इन्सान बन कर हम इतनी क़यामतें ढा सकते हैं, इस क़दर फ़ित्ने बरपा कर सकते हैं तो वापिस बंदर बन कर हम ख़ुदा मालूम क्या कुछ कर सकते हैं ?
अफ़्साना निगारी मेरा पेशा है, मैं इस के तमाम आदाब से वाक़िफ़ हूँ।।
इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।।
जी हां हम आज बात करने वाले हैं ऊर्दू शायरी के मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी के बारे में कैफ़ी आज़मी साहब का असली नाम सय्यद अतहर हुसैन रिज़वी था इनका जन्म 14 जनवरी 1918 को आजमगढ़ में हुआ । ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे ये अपने नज्मों से इंकलाब लाने की ताकत रखते थे। कैफ़ी साहब ने हीर रांझा, काग़ज़ के फूल , हक़ीक़त जैसी मशहूर फिल्मों के लिए गाने लिखे। फिल्मी दुनियां और मुशायरों की दुनियां में बड़े से बड़े सम्मानों से नवाजे गए। आज ही के दिन 10 मई 2002 को दुनियां का ये चमकता सितारा दुनियां -ए -फानी से रुखसत हों गया था। आइए जानते है इनके लिखे मशहूर शेर..
• बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए। इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए।।
• रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई। तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।।
• गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो। डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ।
• पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था। जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा।
• जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क। यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े।।
• तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो। क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो।
• इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े।।
• रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए रोज़ धरती में समा जाते हैं।
Mothers day: वैसे तो एक दिन नहीं बल्कि हर दिन मां का होता हैं या यूं कहें मां से ही दिन शुरू होता हैं। लेकिन आज का दिन लोग स्पेशल तौर पर मानते है और आपने मां से मोहब्बत जाहिर करते हैं। लोग सोशल मीडिया पर आपने मां के साथ शेर लिखकर फ़ोटो अपलोड करते हैं। क्या आप जानते हैं की ये सब मशहूर शेर किन शेयरों के लिखें हैं .. तो आइए जानते हैं..
चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।।
~ मुनव्वर राना
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है।।
~मुनव्वर राना
दुआ को हात उठाते हुए लरज़ता हूँ। कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए।।
~ इफ्तिखार आरिफ
जमी इतराने लगी आसमा नजर आने लगा। मां के क़दमों को जैसे चूमा मुझे जन्नत नज़र आने लगा।
~ k.s Siddiqui
माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज। हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले।।
~ कैफ भोपाली
मैं ने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दें। सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया।
~ मुनव्वर राना
मैं ने माँ का लिबास जब पहना। मुझ को तितली ने अपने रंग दिए।
~ फातिमा हसन
मुद्दतों ब’अद मयस्सर हुआ माँ का आँचल मुद्दतों ब’अद हमें नींद सुहानी आई।।
डॉ. बशीर बद्र उर्दू शायरी के महान शायरों में शामिल हैं इनकी ग़ज़ले देश हो या विदेश हर जगह धूम मचाती है। मोहब्बत करने वाले इनके शेर को पढ़े बिना मोहब्बत को अधूरा समझते हैं। कहा जाता है की जब बशीर बद्र शेर लिखने बैठते थे तो आपने जहन के उस गहराई में जाकर शेर निकाल लाते थे जो सीधा रूह का ताल्लुक़ रखती हैं।
डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फ़रवरी 1935 को कानपुर में पैदा हुए। ये बचपन से ही शायरी के शौकीन थे। इनकी उम्र जब 20 वर्ष थी तभी इनकी लिखी ग़ज़ले हिन्दुस्तान और पकिस्तान में प्रकाशित होने लगीं ।
इनके शेर को प्रधान मंत्री इंद्रा गांधी ने भी पढ़ा…
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।।
बशीर बद्र उर्दू ग़ज़ल को नई पहचान दिलाई
बशीर बद्र ने अपने गज़लों में नए नए शब्दों को सामिल कर के पुरी की पुरी नई ग़ज़ल ही कहने की कोशिश की और कामयाब रहें। इन्होने महबूब का हुस्न हों या मजलूम का दर्द दोनों को साथ में पिरोया और लोगों तक पहुंचाया।
• ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं। पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।।
• बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना। जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।।
• हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं। उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में ।।
इस सदी के सबसे बड़े शायर मुनव्वर राणा जिन्होंने इस दौर में बता दिया की शेर और ग़ज़ल महबूब के जुल्फों और उसके हुस्न पर नहीं बल्कि मां के झुर्रियां भरे चेहरे, नम आंखों, और मैले आंचल पर भी होता हैं। इनके शेर में बखूबी मां का दर्द मां का ममता देखने को मिलता हैं ।
मां पर शेर कहना इतना आसान नहीं था..
ये बात हैं उस दौर की जब लोग हुस्न के दीवाने हुआ करते थे शेर और गजलें सिर्फ़ महबूब के जुल्फों और उसके चेहरे तक ही सीमित थी। हर शायर इन्ही पर शेर कहते थे। लेकिन उस दौर में मुनव्वर राना साहब आपने शेर और गजलों को नया रूप दिया और शेर और गज़लों को ‘कोठे से घसीट कर मां आंचल तक लाए‘ और फिर क्या था हिन्दुस्तान से लेकर दुबई तक उनके शेर की धूम मच गई। और इनकी सफलता रातों रात बालंदी पर पहुंच गई।
मां पर लिखें इनके बेहतरीन शेर..
• चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है। मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।।
• अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा। मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है।।
• इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है। माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है।।
• जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है। माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।।
• कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में। ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है।।
• तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक। मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी।।
• मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना। जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती।।
• ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ। इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा।।
• ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता। मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सज्दे में रहती है।।
• शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ । माँ की उँगली थाम कर चलना बहुत अच्छा लगा।।
जैसा कि आप सब जानते ही होंगे 1 मई को पूरी दुनिया में मज़दूर दिवस मनाया जाता हैं। और ये देश बनाने में सबसे बड़ा योगदान मजदूरों का हैं। इसी लिए हर दौर के शायरों ने मजदूरों के दर्द को बखूबी आपने शायरी में उतरने की कोशिश की हैं। आइए जानते हैं मज़दूर के उपर लिखें शायरों के चुनिंदा शेर..!
मज़दूर दिवस
सो जाते हैं फूटपाथ पर अख़बार बिछाकर मज़दूर कभी नींद की गोली नही खाते ।
~ मुनव्वर राणा
तू क़ादिर ओ आदिल है मगर तेरे जहाँ में हैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात।
~ डॉ अल्लामा इक़बाल
सरों पे ओढ़ के मज़दूर धूप की चादर ख़ुद अपने सर पे उसे साएबाँ समझने लगे।
~ शारिब मौरान्वी
ख़ून मज़दूर का मिलता जो न तामीरों में न हवेली न महल और न कोई घर होता।
~हैदर अली जाफरी
आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए।।
~हफीज जालंधरी
फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं।।
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा लखनऊ के बेहद ही गर्म मिजाज़ के शायर माने जाते हैं। ये मीर तकी मीर के समकालीन शायर थे। इन्होंने ऊर्दू शायरी में “रेख्ती” विधा का शुरुआत किया। और एक से बढ़कर एक कलाम लिखें जो आज भी लोगो के जुबां पर रहता है।
जन्म- 1752 मुर्शिदाबाद, भारत
मृत्य- 1 मई 1817 दिल्ली
आइए जानते हैं इनके लिखे हुए कुछ शेर..
• क्या हँसी आती है मुझ को हज़रत-ए-इंसान पर। फ़ेल-ए-बद ख़ुद ही करें लानत करें शैतान पर।।
• चाहता हूँ तुझे नबी की क़सम। हज़रत-ए-मुर्तज़ा-अली की क़सम
मुझे ग़मगीं न छोड़ रोता आज। तुझे अपनी हँसी-ख़ुशी की क़सम।।
• कुछ इशारा जो किया हम ने मुलाक़ात के वक़्त। टाल कर कहने लगे दिन है अभी रात के वक़्त।।
• अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है। कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है।।
• कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं। बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं।।
• ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है। ये आग इश्क़ की या-रब किधर से उतरी है।।
• हज़ार शैख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन की सी। मगर वो बात कहाँ मौलवी मदन की सी।।
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